24/09/2017

मैथिल ब्राह्मण

मैथिल ब्राह्मणों का नाम मिथिला के नाम पर पड़ा है। मिथिला के ब्राह्मणो को मैथिल ब्राह्मण कहा जाता है |
 मिथिला भारत का प्राचीन प्रदेश है |
जिसमे बिहार का तिरहुत, सारन तथा पूर्णिया के आधुनिक ज़िलों का एक बड़ा भाग और नेपाल से सटे प्रदेशों के भाग भी शामिल हैं। जनकपुर , दरभंगा और मधुबनी मैथिल ब्राह्मणो का प्रमुख सांस्कृत केंन्द्र है |
मैथिल ब्राह्मण बिहार , नेपाल , ब्रज उत्तर प्रदेश व झारखण्ड के देवघर मे अधिक है |
 पंच गौड़ ब्राह्मणो के अंतर्गत मैथिल ब्राह्मण , कान्यकुब्ज_ब्राह्मण, सारस्वत ब्राह्मण , गौड़ ब्राह्मण , उत्कल ब्राह्मण है |

ब्रजस्थ मैथिल ब्राह्मण
ब्रजस्थ मैथिल ब्राह्मण वे ब्राह्मण हैं जो गयासुद्दीन तुग़लक़ से लेकर अकबर के शासन काल तक तिरहुत (मिथिला) से तत्कलीन भारत की राजधानी आगरा मे बसे तथा समयोपरान्त केन्द्रीय ब्रज के तीन जिलो मे औरङ्जेब के कुशासन से प्रताडित होकर बस गये। ब्रज मे पाये जाने वाले मैथिल ब्राह्मण उसी समय से ब्रज मे प्रवास कर रहे है। जो कि मिथिला के गणमान्य विद्वानो द्वारा शोधोपरान्त ब्रजस्थ मैथिल ब्राह्मणो के नाम से ज्ञात हुए। ये ब्राह्मण ब्रज के आगरा, अलीगद, मथुरा और हाथरस मे प्रमुख रूप से रहते है। यहा से भी प्रवासित होकर यह दिल्ली, अजमेर्, जयपुर, जोधपुर्, बीकानेर्, बडौदरा, दाहौद्, लख्ननऊ, कानपुर आदि स्थानो पर रह रहे है। मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने मिथिला सहित सम्पूर्ण भारत पर अपने शासन काल में अत्याचार किया इसके अत्याचार से पीड़ित होकर बहुत से मिथिलावासी ब्राह्मण मिथिला से पलायन कर अन्य प्रदेशों में बस गए ब्रिज प्रदेश में रहने वाले मैथिलों व मिथिलावासी मैथिलों का आवागमन भी बंद हो गया ऐसा १६५८ ई० से लेकर १८५७ की क्रान्ति तक चलता रहा . १८५७ ई० के बाद भारतीय समाज सुधारकों ने एक आजाद भारत का सपना देखा था मिथिला के ब्राह्मण समाज भी आजाद भारत का सपना देखने लगे 'स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने ठीक इसी समय जाती उत्थान की आवाज को बुलंद किया उन्होंने जाती उत्थान के लिए सम्पूर्ण भारत में बसे मिथिला वासियों से संपर्क किया जिसका परिणाम यह हुआ की औरंगज़ेब के समय में मिथिलावासी और प्रवासी मैथिल ब्राह्मणों के जो सम्बन्ध टूट गए थे वह फिर से चालु हो गए उन्ही के प्रयासों से अलीगढ के मैथिल ब्राह्मणों का मिथिला जाना और मिथिलावासियों का अलीगढ आना संभव हुआ इसी समय स्वामी जी ने मिथिला से लौटकर अलीगढ में मैथिल सिद्धांत सभा का आयोजन किया सिद्धांत सभा के कार्यकर्ताओं और मिथिलावासी रुना झा द्वारा १८८२ से १८८६ के बीच पत्र व्यवहार आरम्भ हुआ
पंजी व्यवस्था
मैथिल ब्राह्मणो मे पंजी व्यवस्था है जो मैथिल ब्राह्मणो और मैथिल कायस्थो कि वंशावली लिखित रूप से रखती है आज कल यह प्रथा समाप्त हो रही है |
मैथिल ब्राह्मणो के उपनाम व वयवस्था
झा , मिश्र , पाठक ,औझा , शर्मा , चौधरी , ठाकुर , राँय , परिहस्त , कुंवर है | जिसमे से कुंवर , चौधरी , ठाकुर मिथिला देश मे ब्राह्मणो ( मैथिल और भूमिहार ) के अलावा कोई अन्य नही प्रयुक्त करता है | ब्रजस्थ मैथिल ब्राह्मण शर्मा उपनाम प्रयोग करते है | झा और मिश्र (अथवा मिश्रा) मैथिल ब्राह्मणो के सबसे अधिक प्रयोग मे लाये जाने वाले उपनाम हैं | झा सिर्फ मैथिल ब्राह्मणो का उपनाम है |

सभी मैथिल ब्राह्मण चार वर्ग मे बटे है १- श्रोत्रिय , २- योग्य , ३- पंजी , ४- जयवार ईसम उपर वाला वर्ग नीचे वाले वर्ग की कन्या से विवाह करता है एैसा ईसलिये क्योकि मिथिला के राजा ने प्राचीनकाल मे गायत्री संध्या वंदन मे ब्राह्मणो को बुलाया दिन के चार प्रमुख पहरो मे ब्राह्मण पहुंचे तभी से एैसी व्यवस्था चली आरही है | पंजी व्यवस्था मिथिला के राजा के आदेश पर शुरू हुयी | यह दोनो ही प्रथाये आजकल समाप्त हो रही है |
मैथिल ब्राह्मणो के साथ साथ अन्य प्रमुख ब्राह्मण समुदाय कान्यकुब्ज ब्राह्मण , भूमिहार ब्राह्मण भी मिथिला मे है मैथिल ब्राह्मण जनकपुर मिथिला देश मे है |
सन्दर्भ

मैथिल ब्राह्मणो की पंजी व्यवस्था लेखक पं गजेन्द्र ठाकुर

17/09/2017

इस वर्ष 2017 को शारदीय नवरात्रों का आरंभ

नवरात्र का पर्व, भारत में हिन्दू धर्म ग्रंथ एवं पुराणों के अनुसार माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरुपो की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। हिन्दू पंचांग की गणना के अनुसार Navratri वर्ष में चार माह – चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीने की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक नौ दिन के होते हैं, लेकिन लोग चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य रूप से मनाते है । नौ दिन और रात्रि के समावेश होने के कारन इस पर्व को Navratri (नवरात्र ) के नाम से जानते है । नवरात्रों में लोग अपनी मनोकामना सिद्ध करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं। सभी नवरात्रों में माता के सभी 51 पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता के दर्शनों के लिये एकत्रित होते हैं।

नवरात्र शब्द, नव अहोरात्रों का बोध कराता है। नव मतलब शक्ति के नौ रूप । अहोरात्रों शब्द रात्रि और सिद्धि का प्रतीक है। शास्त्रों में उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रियों को महत्त्व दिया जाता है।
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घट स्थापना शुभ मुहूर्त |

इस वर्ष 2017 को शारदीय नवरात्रों का आरंभ 21 सितंबर, आश्चिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होगा. दुर्गा पूजा का आरंभ घट स्थापना से शुरू हो जाता है अत: यह नवरात्र घट स्थापना प्रतिपदा तिथि को 21 सितंबर, के दिन की जाएगी. इस दिन सूर्योदय से प्रतिपदा तिथि, हस्त नक्षत्रहोगा, सूर्य और चन्द्रमा कन्या राशि में होंगे.

आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है. व्रत का संकल्प लेने के पश्चात ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है. इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है. घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है. तथा “दुर्गा सप्तशती” का पाठ किया जाता है. पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिए.
☆ घटस्थापना मुहूर्त -> प्रातः 06:12 से 08:09
☆ अवधि -> 1 घण्टा 56 मिनट्स

प्रतिपदा तिथि क्षय होने के कारण घटस्थापना मुहूर्त अमावस्या तिथि के दिन निर्धारित किया गया है।
☆ पहला नवरात्र, प्रथमा तिथि – 21 सितंबर 2017, दिन बृहस्पतिवार
☆ दूसरा नवरात्र, द्वितीया तिथि – 22 सितंबर 2017, दिन शुक्रवार.
☆ तीसरा नवरात्र, तृतीया तिथि – 23 सितंबर 2017, दिन शनिवार.
☆ चौथा नवरात्र, चतुर्थी तिथि – 24 सितंबर 2017, रविवार.
☆ पांचवां नवरात्र , पंचमी तिथि – 25 सितंबर 2017, सोमवार.
☆ छठा नवरात्र, षष्ठी तिथि – 26 सितंबर 2017, मंगलवार.
☆ सातवां नवरात्र, सप्तमी तिथि – 27 सितंबर 2017, बुधवार
☆ आठवां नवरात्र, अष्टमी तिथि – 28 सितंबर 2017, बृहस्पतिवार,
☆ नौवां नवरात्र, नवमी तिथि – 29 सितंबर 2017, शुक्रवार
☆ दशहरा, दशमी तिथि – 30 सितंबर 2017, शनिवार .घट स्थापना ,कलश स्थापना


नवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व होता है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है।

घट स्थापना प्रतिपदा तिथि के पहले एक तिहाई हिस्से में कर लेनी चाहिए। इसे कलश स्थापना भी कहते है।

कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य

में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है।

इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।

घट स्थापना की सामग्री


जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। यह वेदी कहलाती है।

— जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी जिसमे कंकर आदि ना हो।

— पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है )

— घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश ( सोने, चांदी या तांबे का कलश भी ले सकते है )

— कलश में भरने के लिए शुद्ध जल

— गंगाजल

— रोली , मौली

— इत्र

— पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी

— दूर्वा

— कलश में रखने के लिए सिक्का ( किसी भी प्रकार का कुछ लोग चांदी या सोने का सिक्का भी रखते है )

— पंचरत्न ( हीरा , नीलम , पन्ना , माणक और मोती )

— पीपल , बरगद , जामुन , अशोक और आम के पत्ते ( सभी ना मिल पायें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते है )

— कलश ढकने के लिए ढक्कन ( मिट्टी का या तांबे का )

— ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल

— नारियल

— लाल कपडा

— फूल माला

— फल तथा मिठाई

— दीपक , धूप , अगरबत्ती 

घट स्थापना की विधि

सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो

तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगह

छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिटटी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का

छिड़काव करें।



कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें।

कलश में साबुत सुपारी , फूल और दूर्वा डालें। कलश में इत्र , पंचरत्न तथा सिक्का डालें। अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्ते

थोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें।



नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुँह आपकी तरफ

होना चाहिए। यदि नारियल का मुँह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानते

है , पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है ।



अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें। अब देवी देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि

” हे समस्त देवी देवता आप सभी नौ दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों “।



आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवता गण कलश में विराजमान है। कलश की पूजा करें।

कलश को टीका करें , अक्षत चढ़ाएं , फूल माला अर्पित करें , इत्र अर्पित करें , नैवेद्य यानि फल मिठाई आदि अर्पित करें।



घट स्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी माँ की चौकी स्थापित करें।
  

देवी माँ की चौकी की स्थापना और पूजा विधि


लकड़ी की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें।

साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें।

इसे कलश के दायी तरफ रखें।

चौकी पर माँ दुर्गा की मूर्ति अथवा फ्रेम युक्त फोटो रखें।

माँ को चुनरी ओढ़ाएँ।

धूप , दीपक आदि जलाएँ।

नौ दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योत जलाएँ।

देवी मां को तिलक लगाए ।

माँ दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानि हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें ।

काजल लगाएँ ।

मंगलसूत्र, हरी चूडियां , फूल माला , इत्र , फल , मिठाई आदि अर्पित करें।

श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ , देवी माँ के स्रोत , सहस्रनाम आदि का पाठ करें।

देवी माँ की आरती करें।

पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें।



रोजाना देवी माँ का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम ना छिड़के । जल इतना हो कि

जौ अंकुरित हो सके। ये अंकुरित जौ शुभ माने जाते है। । यदि इनमे से किसी अंकुर का रंग सफ़ेद हो तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है।

यह दुर्लभ होता है।

नवरात्री के व्रत उपवास

नवरात्री में लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी माँ की भक्ति करते है। कुछ लोग पलंग के ऊपर नहीं सोते। कुछ लोग शेव नहीं करते , कुछ

नाखुन नहीं काटते। इस समय नौ दिन तक व्रत , उपवास रखने का बहुत महत्त्व है। अपनी श्रद्धानुसार एक समय भोजन और एक समय

फलाहार करके या दोनों समय फलाहार करके उपवास किया जाता है। इससे सिर्फ आध्यात्मिक बल ही प्राप्त नहीं होता , पाचन तंत्र भी

मजबूत होता है तथा मेटाबोलिज्म में जबरदस्त सुधार आता है।



व्रत के समय अंडा , मांस , शराब , प्याज , लहसुन , मसूर दाल , हींग , राई , मेथी दाना आदि वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसके

अलावा सादा नमक के बजाय सेंधा नमक काम में लेना चाहिए।

नवरात्री में कन्या पूजन


महाअष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ नवमी के दिन कन्या पूजन करते है। परिवार

की रीति के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है। तीन साल से नौ साल तक आयु की कन्याओं को तथा साथ ही एक

लांगुरिया (छोटा लड़का ) को खीर , पूरी , हलवा , चने की सब्जी आदि खिलाये जाते है। कन्याओं को तिलक करके , हाथ में मौली बांधकर,

गिफ्ट दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लिया जाता है , फिर उन्हें विदा किया जाता है।

महानवमी और विसर्जन


महानवमी के दिन माँ का विशेष पूजन करके पुन: पधारने का आवाहन कर, स्वस्थान विदा होने के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश के जल

का छिड़काव परिवार के सदस्यों पर और पूरे घर में किया जाता है। ताकि घर का प्रत्येक स्थान पवित्र हो जाये। अनाज के कुछ अंकुर माँ के

पूजन के समय चढ़ाये जाते है। कुछ अंकुर दैनिक पूजा स्थल पर रखे जाते है , शेष अंकुरों को बहते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है। कुछ

लोग इन अंकुर को शमीपूजन के समय शमी वृक्ष को अर्पित करते हैं और लौटते समय इनमें से कुछ अंकुर केश में धारण करते हैं ।