दीवारों


दीवारों पर खून छिड़क कर
हाक़िम अपना नाम करेंगे
जिनके किरदार अधूरे
दूने अपने दाम करेंगे


अपनी नींदें पूरी करके
मेरी नींद हराम करेंगे
जिस दिन मेरी प्यास मरेगी
मेरे हवाले जाम करेंगे

वो मेरा ही काम करेंगे
जब मुझको बदनाम करेंगे
अपने ऐब छुपाने को वो
मेरे क़िस्से आम करेंगे


क्यों अपने सर तोहमत लूं मैं
वो होगा जो राम करेंगे
कल कर लेंगे कल कर लेंगे
यूँ हम उम्र तमाम करेंगे

सोच-सोच कर उम्र बिता दी
कोई अच्छा काम करेंगे
कोई अच्छा काम करेंगे
खुदको फिर बदनाम करेंगे !!

मेस्सगिंग

मिल कर खुश हुए तो क्या हुए ..
बिना मिले रिश्ते निभाना ज़िन्दगी है ..



कांटो पर चलने सह किसे परहेज़ हैं ,
मगर इस रास्ते के शुरुवात चाहिए ,









हेर मिलाने वालो को तेरी याद आती रहे
फूल बनकर मुस्कुराना ज़िन्दगी है ..
मुस्कुरा के गम भुलाना ज़िन्दगी है .



किस किसी की महफ़िल मैं ,
 किस किसी किस किसी को किस किया
एक हम है जिस ने हेर किस को मिस किया
 और एक आप है जिस ने हेर मिस को किस किया …


मरते हुए ज़मीन सह ले जाऊं मैं ऐसी बात चाहिए
कफ़न भी ओद लूँ मगर दमन तेरा मेरे साथ चाहिए


शहीद भी हो जाऊं इस रास्ते में तोह ग़म नहीं ,
मगर उनकी जीने की भी तोह वजहात चाहिए ,


 


दिल कभ पिघलींगे इस ज़माने की यह पता किसे ,
जज्बा -इ -दिल जान्ने तोह दिल में जज़्बात चाहिए ,



दुआ मेरी हैं खुदा सह की मंजिल तक जियूँ ,
कभी तोह खुबूल हो ऐसे हालात चाहिए ,


हर दिन होता हैं इंतज़ार एक नई उम्मीद का ,
मगर उदासी कथं हो जाए ऐसी रात चाहिए ,





हर सुभह तेरी मुस्कराती रहे ,
हर श्याम तेरी गुनगुनाती रहे ,
दोस्त तू जिसे से भी मिले


मोहब्बत

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा

एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा

कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा

वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

 

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को

मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा

किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं

कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

 

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,

दिल कहता है 

कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा

और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,

शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

 

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे

शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा

अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,

किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! 

 

अब के ना शामिल करना मेरा नाम

ग़र ये खेल ही दोबारा होगा

 उनकी तस्वीर को सिने से लगा लेते हैं !

इस तरह जुदाई का गम मिटा देते हैं !!

किसी तरह कभी उनका जिक्र हो जाये तो !

भींगी पलकों को हम झुका लेते हैं !!

दोस्त कह कर दोस्त से दगा कर बैठा !

वो आज एक ऐसा खता कर बैठा !!

कहता था तुझे कभी हम खपा ना होने देगे !

आज वो खुद ही हमें खपा कर बैठा !!]

आदत थी 

 

उसे सबोके गमो को दूर करने की लेकिन !

हमारे लिए ही वो गमो की दुआ कर बैठा !!

 हर बार मुझे जख्म ए दिल ना दिया कर !

तू मेरी नहीं तो मुझे दिखाई ना दिया कर !!

सच-झूठ तेरी आँखों से हो जाता हैं जाहिर !

क़समें ना खा, 

 

इतनी सफाई ना दिया कर !!

उनका हाल भी कुछ आप जैसा ही होगा !

आपका हाले दिल उन्हें भी महसूस होगा !!

बेकरारी के आग में जो जल रहे हैं आप !

आपसे ज्यादा उन्हें इस जलन का एहसास होगा !!

एय मेरी जिन्दगी यूँ मुझसे दगा ना कर !

उसे भुला कर जिन्दा रहू दुआ ना कर !!

कोई उसे देखता हैं तो होती हैं तकलीफ !

एय हवा तू भी उसे छुवा ना कर …. !!


 

सायरी

सायरी वो भी लव

कल रात आखो में एक आँसू आया


में ने उसे पूछा तू बहार क्यों बहार आया ?

तो उसने बोला की कोई मेरे आखो पे इतना है समाया की

में चाह कर भी आपनी जगह बना नही पाया

कोई कहे मोहब्बत की किरदार से

प्यार वो साया है 

जो मिलता नही है हजारो से

हम तो पहेले ही जले बैठे महोबत में क्यों डरते है

देहेकते आन्गारू से “



कसीस दिल की हर चीज सिखा देती है

बंद आखो में सपना सज देती है

सपनों की दुनिया जरूर सजाकर रखना

क्यों की हकीकत तो 

एक दिन सब को रुला देती है “



“आपनो ने हमें जेहेरका जम दे दिया

प्यार को बेवफाई का नाम दे दिया

जो कहेते थे भूल ना जाना

उन्हों ने तो भूल जाने का पैगाम दे दिया “

 

अपनों से नाता तोड़ देते है

रिश्ता गिरो से जोड़ लेते है

बहो में रहेकर किसी की वो

हमसे वफ़ा का इकरार करते है

ये कैसे चाहत है ये जानकर भी

से प्यार करते है “

 

शिकायत

शिकायत है 

उन्हें कि हमें मोहब्बत करना नही आता,
शिकवा तो इस दिल को भी है……… 


 पर इसे शिकायत करना नहीं आता

जब मैं हसा था,

 कौन मेरे साथ मुस्कुराया था कौन है

मेरा दोस्त जो तब मेरे पास आया था 

जब मै ग्रमज्रदा था,

 

क्या किसी ने आंसू बहाया था या यह है

मेरा दोस्त जिसने निशां आसुंओं का मिटाया था अधूरी सी है





हर एक से अच्‍छी बात करना फितरत है हमारी

हर इक खुश रहे ये हसरत है 

हमारी कोई हमकों याद करे या ना करे

हर इक को याद करना आदत है हमारी

 

अगर आप हर पल कुछ नया चाहते हैं

कुछ कर गुजरना चाहते हैं

तो  उसके लिए प्‍लेटफार्म हम देंगें

ये आपसे हमारा वादा है



चाहे

वफ़ा के रंग में डूबी हर शाम तेरे लिए ,

यह डगर,

 यह नगर,

 

मेरा नाम बस तेरे लिए,

तू महेक्ति रहे चांदनी रातों की तरह,

इस नए साल का पैगाम तेरे लिए


लड़का लड़की का प्यार बहुत समय से चला आ रहा

हैं यह प्यार हमारे देश की शान हैं क्योकी प्यार से

बढ़ कर कुछ भी नही मन जाता इसलिए प्यार से

कभी भी  नही डरना चाहिए प्यार तो हर उमर में हो

सकता हैं वो चाहे जवानी हो या बुढापा इसलिए प्यार

ही सब कुछ हैं

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ये न हो तो कुछ भी नही सब बेकार हैं

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और भगवान ने भी प्यार को सर्व पर्थ्म मन हैं

इसलिए मेरी राय से सबको प्यार करना चाहिए

दोस्त  तो  बहुत  मिलते  हैं  ज़माने  में

पर  हर  मोड़  पर  साचा  यार  नहीं  मिलता

 

यार  तो  बहुत  होते  हैं

दिल  लगाने  की

पर  हर  यार  से  सचा  प्यार  नहीं  मिलता

*******

 

शाह  जहाँ  ने  ताज  महल  की  हर  दीवार  को  देखा,

चार  मीनार  को  देखा  और  कहा “

माँ  कसम  कितना  खर्चा  हो  गया”.

*******



 

फूलों  से  क्या  दोस्ती  करते  हो  वह  तो  मुरझा  जाते  हैं,

करना  है  तो  कांटो  से  दोस्ती  करो  जो  चुभ  कर  भी  याद  आते  हैं

 

 

 

 

कहानियां

दद्दू की चिट्ठीकहानियां 

santosh says
उबलते दूध में पानी के कुछ छींटे जो काम करते हैं,
 ठीक वैसा ही असर पापा के पत्र से हुआ।
 विनीत और मधुर एकाएक शांत हो गए थे।
दो दिन से गृहयुद्ध चल रहा था। 

यूं उनके बीच जंग की शुरुआत शादी के कुछ दिन बाद ही हो गई थी। 
उन्हीं दिनों विनीत की नौकरी का छूटना भी कोढ में खाज साबित हुआ। 
उसके मम्मी-पापा उनके मध्यस्थ बने और यथासंभव उनकी आर्थिक जरूरतें भी पूरी करते रहे। 
अंतत: साल भर की बेकारी के बाद विनीत को मुंबई में नौकरी मिल गई, 
उन्हीं दिनों कनु का जन्म हुआ था।
अब नन्हा-अबोध कनु मां-बाप के बीच की कलह का चश्मदीद गवाह था। 
कभी-कभी उनके गुस्से का शिकार भी बनता।
 इधर वह रो रहा था, उधर गुस्से से मधुर का पारा चढ रहा था। पालना आता भी है तुझे। 
फुल टाइम सर्वेट है और रात भर इसके डायपर मैं बदलता हूं, 
फिर भी हाय-हाय! 
तुझे तो सोने से ही फुरसत नहीं मिलती।
 गुस्से से बोला विनीत। हां! मैं सोती रहती हूं 
और खाना तुम्हारी मां बनाकर रख जाती है। 
मां को बीच में घसीटा तो.. 
विनीत तमककर उसकी ओर गुर्राया था। 
पर अचानक वह शांत हो गया।
मारकर दिखा.. 
मुझे भी ईश्वर ने दो हाथ दिए हैं,
 चेहरा नोंच लूंगी। 
मैं वैसी लडकी नहीं हूं,
 जो चुपचाप सब सहती रहूंगी।
 विनीत बिल्कुल शांत हो गया था।
 उसकी आंखें नम थीं। 
दरअसल उसे अपने पापा का भेजा गया पत्र याद आ गया था, 
जो उसके ऑफिस के पते पर आया था।
 पत्र निकालकर उसने मधुर की ओर फेंक दिया।
 विनीत की डबडबाई आंखें पत्र देखकर किसी अनहोनी की आशंका से सकपका गर्इं। 
 मधुर ने आगे बढकर पत्र उठा लिया और पढने लगी।
प्यारे बच्चों! पत्र पाकर तुम्हें आश्चर्य तो होगा
 कि आज के हाइटेक जमाने में पत्र! 
परन्तु मुझे लगता है
 कि विस्तार से सोच-विचारकर सहज भाव-से अपनी बात कहने का इससे अच्छा दूसरा माध्यम नहीं।
 अस्तु! 
पत्र लिखने का कारण यही था 
कि तुम लोगों से फोन पर बातें तो होती रहती हैं, 
 पर हमारा मन नहीं भरता। 
यही आस रहती है कि बातें हों,
 जिससे तुम्हारी चुहल, 
 खिलखिलाहट और हंसी सुनाई दे।
 तुम्हारी बातों में जीवन के प्रति भरपूर उत्साह महसूस हो। 
घर-बाहर, खाना-पीना, 
सोना-जागना, कहना-सुनना,
 तुम्हारा सब कुछ खुशियों का स्पर्श पाकर प्रस्फुटित हो। 
तुम्हें भी कनु को देखकर ऐसा ही 
लगता होगा कि वह हर-पल सानंद रहे, 
किलकारियां मारता फिरे।
 वह अभी अबोध है, 
लेकिन हम क्या करें? 
हमारे बच्चे बडे हो गए हैं। 
उनके दु:ख, मानसिक हैं। 
वे समझदार हैं,
 अपने जीवन के अहम फैसले स्वयं किए हैं। 
उनसे बातें करना उतना सरल नहीं रहा। 
फिर भी हम चाहते हैं, 
उनसे खूब बातें करें,
 बातों-बातों में यह अहसास करा 
सकें कि बडों के अनुभव मात्र उपदेश या 
नसीहत नहीं;
 एक युक्ति होते हैं,
 जिनसे उनके बच्चों को जिंदगी के 
सवाल हल करने में सहायता मिलती है।
एक दिन तुम दोनों ने परिजनों की इच्छा के विरुद्ध साथ रहने का निश्चय किया था। 
वह तुम्हारा प्यार था, 
समर्पण था एक-दूसरे के प्रति। 
यदि वह निश्छल था, 
सही था तो आज तुम्हारे बीच इतनी असंगतियां क्यों हैं? 
 वही निष्ठा और समर्पण कहां लोप हो गया? 
यदि तुम्हें लगता है कि निर्णय गलत था, 
तो उसे सही सिद्ध करने का दायित्व भी तुम्हारा है। 
बच्चों! जीवन-जगत बहुत पुराना है 
और उसमें उतनी ही पुरानी हैं 
वस्तु-स्थितियां और भावनाएं। 
तुम्हारे साथ जो आज घटा है, 
वह भी पुराना है। 
अधिसंख्य लोगों के साथ घटता है।
 तुम्हारा रिश्ता अभी गीली मिट्टी-सा है।
 उसे एक खूबसूरत आकार देने की कोशिश करो 
ताकि भविष्य में एक सुखद परिवार फल-फूल सके।
santosh
इस जगत में सम्पूर्ण स्त्री या 
पुरुष की कल्पना करना बेमानी है।
 हर स्त्री-पुरुष में कमियां हैं, 
तुम दोनों में भी हैं। 
एक-दूसरे की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को बना सको तो बनाओ, 
अच्छी बात है। 
यदि एक-दूसरे को जैसा है-वैसा ही
 स्वीकार कर लो तो और भी अच्छा है। 
प्यार की डगर में अविश्वास की फिसलन से तो 
तुम्हें बचना ही पडेगा। रास्ता कठिन है, 
पर लक्ष्य तक पहुंचना नामुमकिन भी नहीं। 
इम्तिहान तो पास करने ही होंगे,
 जिसके लिए तुम दोनों को अपने बीच से मैं को हटाना पडेगा। 
प्यार और मैं कभी साथ नहीं रहते। 
कनु को बहुत सारे चुंबन और तुम दोनों को प्यार भरा आशीष। 
पत्र पढकर मधुर का चित्त धीरे-धीरे शांत हो गया। 
कुछ देर सहज सन्नाटा पसरा रहा।
 फिर मधुर ने अधिक सहज होने की खातिर विनीत की ओर देखा। 
वह उसी को देख रहा था।
 तब मधुर ने पूछा, खाना खाओगे.. परोस दूं। 
विनीत ने बिना बोले स्वीकृति में सिर हिलाया। 
कनु के लिए यह अबूझ पल थे। 
मम्मी-पापा को शांत देखकर वह मन ही मन खुश हुआ 
और हिम्मत जुटाकर मधुर के पास खिसक आया।
 मधुर बोली ले दद्दू की चिट्ठी! 
तू भी पढ। 

कनु ने विहंसकर पत्र को उलटा-पलटा फिर दद्दू चित्थी-दद्दू चित्थी बोलता हुआ विनीत की गोद में आ गया।
 कुछ दिन बाद एक सुबह विनीत का मोबाइल बजा तो मधुर ने उठाकर सुना। 
रूखा-सा जवाब देकर उसने फोन काट दिया। 
तनाव उसके चेहरे पर तैर आया।
 विनीत ने आकर पूछा तो तुनककर बोली, 
तुम्हारी उसी का फोन था।
 मैं कहती हूं विनीत, 
तुम नहीं सुधरोगे, 
तुम बेशर्म हो गए हो। वह मेरी कलीग है.. 
फोन कर लिया तो क्या हो गया।
 फिर व्यंग्य भरे लहजे में आगे कहा,
 जब उससे रुपये उधार लिये थे, 
तब तुम्हें बुरा नहीं लगा.. 
तब तो खुद फोन करके घर बुलाती थीं।
दरअसल तुम मतलबी हो, सेल्फिश। 
मधुर ने तिनककर जवाब दिया, 
सब बहानेबाजी है। 
तुम मुझसे पीछा छुडना चाहते हो।
 मेरे लिए तुम्हारे पास कुछ नहीं है, 
प्यार, पैसा, टाइम, कुछ भी नहीं।
जानता हूं, तुझे सिर्फ पैसा चाहिए.. 
पैसा। 
चाहे जैसे भी आए और तेरे शौक पूरे हों, बस! 
घर में दो मिनट रहना मुहाल कर दिया है तूने..। 
ठीक है,
 मैं भी जॉब करूंगी और अपनी तरह से जीऊंगी..
 देखना! 
विनीत ने फिर पलटवार किया, 
कनु को, तेरी मां संभालेगी?
बात बढते-बढते, 
गाली-गलौज और हाथापाई तक पहुंच गई। 
कुछ क्रॉकरी  टूट गई।
 खेलते-खेलते कनु 
सहमकर उन दोनों की ओर देखने लगा।
 फिर उसने खिलौनों में पडी चिट्ठी उठाई और
 मधुर की ओर दिखाकर बोला, मम्मी चित्थी! 
दद्दू की चित्थी। 
मधुर आग-बबूला होकर विनीत को जवाब दे रही थी।
 विनीत ने भी उतनी ही विद्रूपता से भरकर कहा, 
भाड में जाओ तुम। 
उधर कनु अभी भी मम्मी को पुकार रहा था। 
वह गुस्से में बिफरती हुई 
उसके पास गई और डांटते हुए बोली, 
चुपकर! 
यह ले, दूध पी। 
भाड में गई तेरे दद्दू की चिट्ठी! 
और फिर उसके हाथ 
से चिट्ठी लेकर एक ओर फेंक दी। 
भय के मारे कनु कांप गया। 
रोना उसकी आंखों में उतर आया, 
पर वह गुमसुम रहा। 
फीडर तो उसके मुंह में था, 
लेकिन पता नहीं दूध उसके गले ;
में उतर भी रहा था या नहीं, 
लेकिन उसकी नजर अभी भी उस चिट्ठी पर थी, 
जो उड-उडकर धीरे-धीरे खिडकी से बाहर की ओर जा रही थी।
santosh says

ना दिल

ना दिल से होता है

ना दिमाक से होता है

ये प्‍यार तो इतफाक से होता है

 

और क्‍या कहे प्‍यार करके भी

प्‍यार न मिले ये इतफाक सिर्फ हामारे साथ होता हैं


आंसू पौछकर हंसाया है मुझे

मेरी गलती पर भी सीने से लगाया है मुझे

कैसे प्‍यार न हो ऐसे दोस्‍त से

जिसकी दोस्‍ती ने जीना सिखाया है मुझै

 

 तु दिल में ना जाये तो मैं क्‍या करू

तु ख्‍यालों से ना जाये तो मैं क्‍या करू

कहते है ख्‍वावों में होगी मुलाकात उनसे

पर नींद न आये तो मैं क्‍या करू


 

बिकता अगर प्‍यार जो कौन नहीं खरीदता

बिकती अगर खुशियां तो कौन उसे बेचता

दर्द अगर बिकता तो हम आपसे खरीद लेते

और आपकी खुशियों के लिए हम खुद को बेच देते

जान

जान

santosh

जब होता है तुम्हारा दीदार,

दिल धङकता है बार-बार,

आदत से मजबुर हो तुम,

ना जाने कब माँग लो उधार

हर तरफ खामोशी का साया है,

जिसे चाहते थे हम वो अब पराया है,

गिर पङे है हम मोहब्बत की भुख से,

और लोग कहते है की पीकर आया है

santosh says
जान से भी ज्यादा उन्हे प्यार किया करते थे,

याद उन्हे दिन रात किया करते थे,

अब उन राहो से गुजरा नही जाता,
santosh says

जहा बैठ कर उनका ईँतजार किया करते थे

प्यासे को इक कतरा पानी काफी है,

ईश्क मे चार पल की जिंदगी काफी है,

डुबने को समँदर मे जायेँ क्यो,

उनकी पलको से टपका वो आँसु ही काफी है

हकीकत जान लो जुदा होने से पहले,

मेरी सुन लो अपनी सुनाने से पहले,

ये सोच लेना भुलाने से पहले,

बहुत रोई है ये आँखे …

santosh kumar jha