धनतेरस पूजा मुहूर्त 2016

धनतेरस के दिन खरीददारी का बहुत अधिक महत्व है। इसके साथ-साथ इस दिन भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय धन्वंतरि भी अपने हाथ में कलश लेकर अवतरित हुए थे। जिस दिन भगवान अवतरित हुए थे उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी थी। जिसे धनतेरस के दिन पूजा का विधान है। जो कि दीपावली से दो दिन पहलें पडता है।
धन्वंतरि का कलश लेकर अवतरित होने के कारण इस दिन कोई बर्तन खरीदने पर आपको कई गुना ज्यादा फल मिलता है। धन्वंतरि को औषधि के देवता भी कहा जाता है।
धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इसके इस दिन उत्पन्न होने के कारण इस दिन इनकी ही पूजा की जाती है। साथ ही इस बार धनतेरस के दिन बहुत ही दुर्लभ योग है। यह योग सोम प्रदोष, चंद्र प्रधान, हस्त नक्षत्र और प्रीति योग का अनोखा संयोग भी बन रहा। यह योग संकेत दे रहा है कि इस दिन जो भी सामान खरीदा जाएगा उसका तेरह गुना लाभ होगा। जानिए धन्वंतरि की पूजा की विधि और किस लग्न में कौन क्या खरीदें ये भी जानिए।   

यह त्योहार कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है क्योंकि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए यह त्यौहार इस तिथि में मनाया जाता है.    
जाने क्या है दीपावली की पूजन विधि
                                          जब धन्वन्तरि प्रकट हुए थे तब उनके हाथ में कलश था जिसके कारण इस दिन नये उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना शुभ रहता है. इस दिन कई लोग धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं. दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं.
धनतरेस तिथि  28 अक्टूबर 2016

धनतेरस पूजा मुहूर्त

  • सुबह 09.00 से दोपहर 12.00,
  • दोपहर 01.30 से 03.00,
  • शाम 06.00 से रात्रि 09.00 तक।

धनतेरस में खरीददारी का मुहूर्त- 

  • दोपहर 12.15, 01.30 से 03.00,
  • शाम 06 से रात्रि 09.00 तक।

धनतेरस पूजन विधि Dhanteras Puja Vidhi

धनतेरस कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है. इस दिन नये उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना शुभ माना जाता है. कहा जाता है की धनतेरस के दिन जितनी खरीददारी की जाती है घर उतना ही धन-धान्य से भरता है. 

देवता यमराज के पूजन की विधि The Method Worship of Yama
धनतेरस के दिन देवता यमराज की पूजा की जाती है. साल का एक यही दिन है जिस दिन देवता यमराज की पूजा की जाती है. इस दिन रात्रि के समय देवता यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है.
  • धनतेरस के दिन रात्रि में एक आते का दिया बनाये. अब इस दिये को घर के मुख्य द्वार पर रखें.
  • रात के समय घर की स्त्रियां दीपक में तेल डालकर नई रूई की बत्ती बनाकर, चार बत्तियां जलाये तथा दीपक की बत्ती दक्षिण दिशा की ओर रखें.
  • अब जल, रोली, फूल, चावल, गुड़, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर स्त्रियां यम का पूजन करें.
  • दीप जलाते समय पूर्ण श्रद्धा से उन्हें नमन तो करें ही, साथ ही यह भी प्रार्थना करें कि वे आपके परिवार पर दया दृष्टि बनाए रखें और किसी की अकाल मृत्यु न हो.
भगवान कुबेर की पूजन विधि The Method Worship of Kuber
धनतेरस की पूजा सही प्रकार तथा सही विधि में करनी चाहिए. इससे घर में सुख-शांति में अनुभव होता है तथा घर में धन की कमी नही होती. साथ ही इस दिन नये उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना शुभ रहता है. शुभ मुहूर्त समय में पूजन करने के साथ सात धान्यों की पूजा की जाती है.
  • धनतेरस के दिन पूजा करने के लिए सबसे पहले तेरह दीपक जला कर तिजोरी में कुबेर की पूजा करें.
  • इसके बाद देव कुबेर को फूल चढाएं.
  • अब भगवान कुबेर का ध्यान करें और बोलें
कि हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वाले, गरूड
मणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृ्त शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर हम आपका ध्यान करते हैं.
  • इसके बाद भगवान कुबेर का धूप, दीप, नैवैद्ध से पूजन करें और मन्त्र पढ़े.
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।’
धनतेरस की पौराणिक कथा Story of Dhanteras
एक जमाने में एक राजा हुआ करते थे. जिनका नाम हेम था। दैव कृपा के कारण उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुयी थी. जब उनके पुत्र की ज्योंतिषियों द्वारा बनवाई गयी तो उससे पता चला की बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी. जब राजा को यह बात पता चली तो उसे बहुत दुःख हुआ. इसलिए राजा ने अपने पुत्र को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े.
  दैवयोग से एक दिन वहां से एक राजकुमारी गुजर रही थी तभी राजकुमार ने राजकुमारी को देखा और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया. जब उन दोनों ने विवाह कर लिया तो विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे. जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा. इसके बाद यमदूत ने यमराज से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए.
                               तब यमराज बोले कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं.

करवा चौथ पूजा मुहूर्त 2016

करवा चौथ

१९वाँ
अक्टूबर २०१६
(बुधवार)

करवा चौथ पर पति को छलनी से देख व्रत का पारण करते हुए

करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय


करवा चौथ पूजा मुहूर्त = १७:५४ से १९:०९
अवधि = १ घण्टा १५ मिनट्स
करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय = २१:०५
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = १८/अक्टूबर/२०१६ को २२:४७ बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त = १९/अक्टूबर/२०१६ को १९:३२ बजे
 
टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी उज्जैन के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)।
२०१६ करवा चौथ

करवा चौथ का व्रत कार्तिक हिन्दु माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। अमांत पञ्चाङ्ग जिसका अनुसरण गुजरात, महाराष्ट्र, और दक्षिणी भारत में किया जाता है, के अनुसार करवा चौथ अश्विन माह में पड़ता है। हालाँकि यह केवल माह का नाम है जो इसे अलग-अलग करता है और सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन मनाया जाता है।

करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी, जो कि भगवान गणेश के लिए उपवास करने का दिन होता है, एक ही समय होते हैं। विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घ आयु के लिए करवा चौथ का व्रत और इसकी रस्मों को पूरी निष्ठा से करती हैं। विवाहित महिलाएँ भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं और अपने व्रत को चन्द्रमा के दर्शन और उनको अर्घ अर्पण करने के बाद ही तोड़ती हैं। करवा चौथ का व्रत कठोर होता है और इसे अन्न और जल ग्रहण किये बिना ही सूर्योदय से रात में चन्द्रमा के दर्शन तक किया जाता है।

करवा चौथ के दिन को करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। करवा या करक मिट्टी के पात्र को कहते हैं जिससे चन्द्रमा को जल अर्पण, जो कि अर्घ कहलाता है, किया जाता है। पूजा के दौरान करवा बहुत महत्वपूर्ण होता है और इसे ब्राह्मण या किसी योग्य महिला को दान में भी दिया जाता है।

करवा चौथ दक्षिण भारत की तुलना में उत्तरी भारत में ज्यादा प्रसिद्ध है। करवा चौथ के चार दिन बाद पुत्रों की दीर्घ आयु और समृद्धि के लिए अहोई अष्टमी व्रत किया जाता है।
२०१७ में करवा चौथ का दि